Tuesday, 19 December 2017
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
सत्य सिर्फ़ अंत है
सत्य सिर्फ़ अंत है सत्य सिर्फ़ अंत है, बाक़ी सब प्रपंच है, फैलता पाखण्ड है, बढ़ता घमण्ड है, किस बात का गुरुर है, तू किस नशे में चूर है समय से ...
-
गुनगुनाती ये बुँदे, कुछ स्वर कर गईं तुम वही हो, या खो गयी हो कहीं नाचती थी जो हाथ फैला, यही पे कहीं खिड़कियों से अब क्यों, ता...
-
1.) अँधेरी रात को , उजाले की किरण दे दे मोहब्बत करने की एक तो वजह दे दे माना की झूट ही झूट फैला है हर तरफ न दे सको कुछ तो , इस सच को जहर ...
-
सत्य सिर्फ़ अंत है सत्य सिर्फ़ अंत है, बाक़ी सब प्रपंच है, फैलता पाखण्ड है, बढ़ता घमण्ड है, किस बात का गुरुर है, तू किस नशे में चूर है समय से ...

No comments:
Post a Comment